पितादिवस विशेष
*पितादिवस विशेष * """ न तो धर्मचरणं किंचिदस्ति महतरम् । यथा पितृ शुश्रूषा तस्य वा वचनक्रिया ।।"" पिता की सेवा अथवा उनकी आज्ञा का पालन करने से बढ़कर कोई धर्म आचरण नहीं है। वाल्मीकि (रामायण, अयोध्या कांड) भारतीय संस्कृति के वाहक पुराण, वैदिक धर्म ग्रंथों का अध्ययन करते हैं तो हमें पता चलता है की पिता शब्द स्वयं में एक देवता शब्द है। जिसकी महिमा कर पाना एक आम मनुष्य का काम नहीं हो सकता है। अपने पिता के द्वारा दिए गए अनुशासन और संस्कारों का जब हम पालन करते हैं तो स्वयं का जीवन स्वर्ग में बदल जाता है। हम स्वयं को श्रेष्ठ महसूस करते हैं, लेकिन आज की परिस्थितियां विपरीत होती जा रही है। प्राचीन संस्कृति को हम भूलते जा रहे हैं दिखावा और आडंबर का जीवन जी रहे हैं। पिता को फूलों का बुके देकर, कुछ उपहार देकर केक काटकर हम अपना कर्तव्य पूर्ण समझते हैं जो कि हमारे भारतीय संस्कृति के अनुरूप सही नहीं है। पुराणों में अनंत काल से ही पिता का महत्व का बखान किया जा चुका है पर हम फादर्स डे पर ही पिता के महत्व को समझ पा रहे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है, यह हमारा दुर्भाग्य...
jay ram ji ahamadguruji
ReplyDeleteजय श्री राम भैया जी
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