पितादिवस विशेष

*पितादिवस विशेष*

""" न तो धर्मचरणं किंचिदस्ति महतरम् ।  
यथा पितृ शुश्रूषा तस्य वा वचनक्रिया ।।""

पिता की सेवा अथवा उनकी आज्ञा का पालन करने से बढ़कर कोई धर्म आचरण नहीं है। वाल्मीकि (रामायण, अयोध्या कांड)

भारतीय संस्कृति के वाहक पुराण, वैदिक धर्म ग्रंथों का अध्ययन करते हैं तो हमें पता चलता है की पिता शब्द स्वयं में एक देवता शब्द है।
जिसकी महिमा कर पाना एक आम मनुष्य का काम नहीं हो सकता है।
अपने पिता के द्वारा दिए गए अनुशासन और संस्कारों का जब हम पालन करते हैं तो स्वयं का जीवन स्वर्ग में बदल जाता है। हम स्वयं को श्रेष्ठ महसूस करते हैं, लेकिन आज की परिस्थितियां विपरीत होती जा रही है।

 प्राचीन संस्कृति को हम भूलते जा रहे हैं दिखावा और आडंबर का जीवन जी रहे हैं। पिता को फूलों का बुके देकर, कुछ उपहार देकर केक काटकर हम अपना कर्तव्य पूर्ण समझते हैं जो कि हमारे भारतीय संस्कृति के अनुरूप सही नहीं है।

 पुराणों में अनंत काल से ही पिता का महत्व का बखान किया जा चुका है पर हम फादर्स डे पर ही पिता के महत्व को समझ पा रहे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है, यह हमारा दुर्भाग्य है की हम अपने संस्कृति को भूलते जा रहे हैं और दूसरों की संस्कृति को सहज और सरल ढंग से आत्मसात करते जा रहे हैं।

मैं फादर्स डे का विरोधी नहीं हूं बल्कि मैं यह बताना चाहता हूं कि फादर्स डे 1908-09 से अमेरिका के द्वारा मनाया जा रहा है जो अब हमारे देश में भी बनाने का प्रचलन हो चुका है। बड़े शहरों में इसे उत्सव रूप में मनाया भी जा रहा है। क्या हम एक ही दिन में या साल के 1 दिन में पिता के द्वारा हमारे लिए किये गये त्याग समर्पण का सकारात्मक परिणाम दिया जा सकता है? उनकी तपस्या का सही मुल्यांकन हो सकता है?
मुझे लगता है कि कभी भी नहीं....।

मैं पाश्चात्य देशों की बात नहीं करता कि वह फादर्स डे कैसे बनाते हैं पर मेरे भारत में फादर्स डे भारतीय संस्कृति के अनुरूप बनाया जा सकता है और बहुत सारे साथी अपनी संस्कृति के अनुरूप मनाते भी होंगे। 

प्रत्येक दिन प्रेम, करुणा, अपनत्व,समर्पण ,सेवा,संस्कारित, अनुशासित,आज्ञाकारी संतान की तरह माता पिता व गुरु के सामने समर्पित रहना वास्तविक रूप से धर्म आचरण होगा।यही तो हमारा अपना जीवन मूल्य है जो भारतीय संस्कृति का अमृत जलधारा है।
भारतीय संस्कृति के महत्व का बखान हमें पुराणों में मिलता है हमारे धार्मिक ग्रंथ युगों युगों से पिता के महत्व को स्पष्ट करते आ रहे  हैं ।
जरूरत है सिर्फ आत्मसात करने का ..... आइए हम सब मिलकर अपनी संस्कृति पर गर्व करें,अपने धार्मिक ग्रंथो का अध्ययन करें, उनके मुल्यों को आत्मसात करें..... फिर पता चलेगा कि हम विश्व को सद्कार्यो के लिए पोषित पल्लवित करते है ,भारत भुमि सर्वश्रेष्ठो की भुमि है......।

"""पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिताहि परम तपः।
 पितरी  प्रीतिमापन्ने सर्वो प्रीयन्ति देवताः।।"""

पिता ही धर्म है पिता ही स्वर्ग है और  पिता ही सबसे श्रेष्ठ तपस्या है।पिता के प्रसन्न हो जाने से सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं।

"""देवतं हि पिता महत्"""अर्थात पिता ही महान देवता है।

                   ........आइए इन्हीं वैदिक, धार्मिक विचारों के साथ माता पिता व गुरु की सेवा करे ..।
जय मां भारती
#अहमदगुरूजी

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